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प्रकार्य (निर्वाचन प्रणाली)

 

परिचय

भारत, शासन की संसदीय प्रणाली के साथ एक संवैधानिक लोकतंत्र है, और इस प्रणाली के केन्द्र में नियमित, स्वतंत्र एवं निष्पक्ष निर्वाचनों को आयोजित करने के प्रति प्रतिबद्धता है। ये निर्वाचन सरकार की संरचना, संसद के दोनों सदनों, राज्यो एवं संघ राज्य-क्षेत्र की विधान सभाओं की सदस्यता, और राष्ट्रपतित्व एवं उप-राष्ट्रपतित्व का निर्धारण करते हैं।

निर्वाचन, संवैधानिक उपबंधों, जिनका संसद द्वारा बनाए गए कानूनों के द्वारा अनुपूरण किया जाता है, के अनुसार संचालित किए जाते हैं। प्रमुख कानून हैं-लोक प्रतिनिधित्वक अधिनियम, 1950, जो मुख्यतया निर्वाचक नामावलियों की तैयारी एवं पुनरीक्षण से सबंधित हैं, लोक प्रतिनिधित्व‍ अधिनियम, 1951 जिसमें निर्वाचनों के संचालन और निर्वाचन उपरांत विवादों के सभी पहलुओं का विस्तृत विवरण है। भारत के उच्चतम न्यांयालय ने अभिनिर्धारित किया है कि जहां निर्वाचनों के संचालन में किसी दी गई स्थिति से निपटने के लिए अधिनियमित कानून चुप है या अपर्याप्ता उपबंध किए गए हैं तो निर्वाचन आयोग के पास उपयुक्त तरीके से कार्रवाई करने के लिए संविधान के अधीन अवशिष्ट शक्तियां हैं।

भारतीय निर्वाचन-प्रचालन की व्यापकता

भारत में निर्वाचन ऐसे आयोजन होते हैं जिनमें आश्चर्यजनक पैमाने पर राजनीतिक लामबंदी और व्यवस्थापन संबंधी जटिलता निहित होती है। लोक सभा के 2004 निर्वाचन में 6 राष्ट्रीय दलों के 1351 अभ्यर्थी, 36 राज्यीय दलों के 801 अभ्यर्थी, आधिकारिक रूप से मान्यता प्राप्त दलों के 898 अभ्यर्थी और 2385 स्वतंत्र अभ्यर्थी थे। 67,14,87,330 लोगों ने मतदान किया। निर्वाचन आयोग ने निर्वाचन का संचालन करने के लिए लगभग 4 मिलियन लोगों को परिनियोजित किया। यह सुनिश्चित करने के लिए कि निर्वाचन शांतिपूर्वक समपन्न किए जाएं, काफी बड़ी संख्या में नागरिक पुलिस और सुरक्षा बल तैनात किए गए।

संसद के निचले सदन (लोक सभा) का फिर से निर्वाचन करने के लिए भारत में साधारण निर्वाचनों के संचालन में दुनिया के सबसे बड़े आयोजन का प्रबंधन करना निहित है। अलग-अलग भौगोलिक एवं मौसमी इलाकों दूर-दूर तक फैले लगभग 700000 मतदान केन्द्रों में निर्वाचक-वर्ग की संख्या 670 मिलियन निर्वाचकों से अधिक हो जाती है। मतदान केन्द हिमालय में हिमाच्छा्दित पर्वतों, राजस्थान के रेगिस्तानों और हिंद महासागर की छितराई आबादी वाले दीपों में अवस्थित हैं।

निर्वाचन-क्षेत्र एवं सीटों का आरक्षण

देश को 543 संसदीय निर्वाचन-क्षेत्रों में विभाजित किया गया है जिनमें से प्रत्येक संसद के निचले सदन, लोक सभा के लिए एक सांसद को निर्वाचित करता है। संसदीय निर्वाचन-क्षेत्रों के आकार एवं बाह्यरूप का एक स्वतंत्र परिसीमन आयोग द्वारा निर्धारण किया जाता है जिसका उद्देश्य ऐसे निर्वाचन-क्षेत्रों का गठन करना होता है जिनमें भौगोलिक विचारणीयताओं और राज्यों एवं प्रशासनिक क्षेत्रों की सीमाओं के अधीन मोटे तौर पर एक समान आबादी हो।

निर्वाचन-क्षेत्र की सीमाएं किस प्रकार निर्धारित की जाती हैं

परिसीमन संसदीय या विधान सभा क्षेत्रों की सीमाओं का यह सुनिश्चित करने के लिए पुननिर्धारण होता है कि प्रत्येक निर्वाचन-क्षेत्र में लोगों की यथा-व्यवहार्य एक समान संख्या हो। भारत में, सीमाएं, आबादी में परिवर्तनों को प्रतिबिंबित करने के लिए दस वर्षीय जनगणना के बाद जांच किए जाने के निमित होती है जिसके लिए संसद कानून के द्वारा मुख्य निर्वाचन आयुक्त और उच्चतम न्यायालय या उच्च न्याायालय के दो न्यायाधीशों या पूर्व-न्या‍याधीशों से बना एक स्वबतंत्र परिसीमन आयोग बनाता है। लेकिन, 1976 के एक संवैधानिक संशोधन के अंतर्गत परिसीमन को प्रकट रूप में, 2001 की जनगणना के बाद तक के लिए निलंबित कर दिया गया था ताकि राज्यों के परिवार नियोजन कार्यक्रमों से लोक सभा एवं विधान सभाओं में उनके राजनीतिक प्रतिनिधित्व पर असर नहीं पडे़। इसके परिणामस्व रूप निर्वाचन-क्षेत्रों के साइज में, सबसे बडे़ निर्वाचन-क्षेत्र में 25,00,000 निर्वाचकों के होने और सबसे छोटे में 50,000 होने के साथ, भारी असंगतियां हो गई हैं। 31 दिसम्बचर, 2003 को प्रकाशित 2001 की जनगणना आंकड़ों के साथ परिसीमन प्रक्रिया, अब, प्रक्रियाधीन है।

स्थानों का आरक्षण

संविधान ने दो सदस्य, जिन्हेंं आंग्ल-भारतीय समुदाय का प्रतिनिधित्व करने के लिए राष्ट्रपति द्वारा नामित किया जा सकता है, के अलावा लोक सभा के आकार को 550 निर्वाचित सदस्यों तक सीमित कर दिया है। आरक्षित निर्वाचन क्षेत्रों के साथ अनुसूचित जातियों और अनुसूचित जनजातियों के प्रतिनिधित्व को सुनिश्चित करने के लिए भी उपबंध हैं जिनमें केवल इन्हीं समुदायों के अभ्यर्थी निर्वाचन के लिए खडे़ हो सकते हैं।

निर्वाचन तंत्र

लोक सभा के निर्वाचन सबसे आगे रहने वाले निर्वाचन तंत्र का उपयोग करके सम्पन्न किए जाते हैं। देश पृथक-पृथक भौगोलिक क्षेत्रों में बंटा हुआ है जिन्हेंे निर्वाचन-क्षेत्र के नाम से जाना जाता है, और निर्वाचकगण एक अभ्यर्थी के लिए एक मत दे सकते हैं (यद्यपि अधिकतर अभ्यर्थी निर्दलीयों रूप में खड़े होते हैं फिर भी, सर्वाधिक सफल अभ्यर्थी राजनीतिक दलों के सदस्यों के रूप में खड़े होते हैं, विजेता वह अभ्यर्थी होता है जिसे सबसे अधिक मत प्राप्त होते हैं)

संसद

संघ की संसद राष्ट्रपति, लोक सभा और राज्य सभा से बनी होती है। राष्ट्रपति राष्ट्राध्यक्ष होते हैं, और वे प्रधानमंत्री को नियुक्त करते हैं जो लोक सभा की राजनीतिक संरचना के अनुसार सरकार चलाते हैं। हालांकि, सरकार की अध्यक्षता प्रधान मंत्री द्वारा की जाती है फिर भी, मंत्रिमंडल निर्णय लेने वाला केन्द्रीय निकाय होता है। एक से अधिक दल के सदस्य सरकार बना सकते हैं, और हालांकि, शासक दल लोक सभा में अल्प मत में हो सकते हैं फिर भी, वे केवल तभी तक शासन कर सकते हैं जब तक कि उन्हें सांसदों, जो लोक सभा के सदस्य हैं, के बहुमत का विश्वास प्राप्तं होता है। लोक सभा, वह निकाय होने के साथ सरकार कौन बनाए, राज्य सभा के साथ मुख्य विधायी निकाय है।

राज्य सभा

राज्य सभा के सदस्य अप्रत्यक्ष रूप से निर्वाचित किए जाते हैं न कि समस्त नागरिकों के द्वारा अधिकतर संघीय प्रणालियों के उलट प्रत्येक राज्य द्वारा निर्वाचित सदस्यों की संख्या कमोबेश उनकी आबादी के अनुपात में होती है। वर्तमान में, विधान सभाओं द्वारा राज्य सभा के 233 सदस्य निर्वाचित किए जाते हैं, और राष्ट्रपति द्वारा साहित्य, विज्ञान, कला एवं सामाजिक सेवाओं के प्रतिनिधियों के रूप में बारह सदस्य भी नामित किए जाते हैं। राज्य सभा सदस्य छह वर्षों के लिए सेवा दे सकते हैं, और प्रत्येक 2 वर्षों में एक तिहाई विधान सभा निर्वाचित होने के साथ निर्वाचन सांतरित होते हैं।

नामित सदस्य

राष्ट्रपति यदि यह महसूस करते हैं कि आंग्ल-भारतीय समुदाय का प्रतिनिधित्व अपर्याप्त है तो वे लोकसभा के 2 सदस्यों को नामित कर सकते हैं, और साहित्य, विज्ञान, कला एवं सामाजिक सेवाओं का प्रतिनिधित्व करने के लिए राज्य सभा के 12 सदस्यों को नामित कर सकते हैं।

राज्य विधान सभाएं

भारत एक संघीय देश हैं, और संविधान राज्यों एवं संघ राज्या-क्षेत्रों को अपनी स्वयं की सरकार के ऊपर उल्लेंखनीय नियंत्रण का अधिकार देता है। विधान सभाएं (विधायी सभाएं) भारत के 28 राज्यों में सरकार का प्रशासन सम्पांदित करने के लिए स्थाापित प्रत्यवक्ष रूप से निर्वाचित निकाय होती हैं। कुछ राज्यों में, ऊपरी एवं निचले दोनों सदनों के साथ विधान-मंडलों के द्विसदनीय संगठन हैं। सात संघ राज्यो-क्षेत्रों में से दो नामत:, राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र, दिल्ली और पांडिचेरी में भी विधान सभाएं हैं।

विधान सभाओं के निर्वाचन, राज्योंं और संघ राज्य-क्षेत्रों को एकल-सदस्यी्य निर्वाचन-क्षेत्रों में विभाजित कर दिए जाने के साथ, लोक सभा निर्वाचन की ही तरह निष्पा दित किए जाते हैं। इसमें भी सबसे आगे रहने वाली निर्वाचन प्रणाली का इस्तेमाल किया जाता है। विधान सभाएं, आबादी के अनुसार, अलग-अलग साइज में होती हैं। 403 सदस्यों के साथ, उत्तर प्रदेश सबसे बड़ी विधान सभा है:, 30 सदस्योंं के साथ पांडिचेरी सबसे छोटी विधान सभा है।

राष्ट्रपति और उप-राष्ट्रपति

राष्ट्रपति विधान सभाओं, लोक सभा, और राज्य सभा के निर्वाचित सदस्यों द्वारा निर्वाचित किए जाते हैं, और 5 वर्ष की अवधि के लिए काम करते हैं (हालांकि वे पुनर्निर्वाचन के लिए खड़े हो सकते हैं)। मतों का आवंटन करने के लिए एक फार्मूले का उपयोग किया जाता है ताकि प्रत्येक राज्य की आबादी और एक राज्य के विधान सभा सदस्य कितनी संख्या में मत डाल सकते हैं, के बीच संतुलन बना रहे, और राज्य विधान सभा सदस्यों और राष्ट्रीय संसद के सदस्यों के बीच एक समान संतुलन मिले। यदि किसी भी अभ्यर्थी को अधिसंख्य मत नहीं मिले तो एक प्रणाली है जिसके द्वारा हारने वाले अभ्यर्थी स्पर्धा से बाहर हो जाते हैं और उनके मत अन्य अभ्यर्थियों को तब तक अंतरित होते रहते हैं जब तक कि एक अभ्यर्थी बहुमत न प्राप्त कर ले। उप-राष्ट्रपति लोक सभा और राज्य सभा के निर्वाचित एवं नामित सभी सदस्यों के प्रत्यक्ष मत के द्वारा निर्वाचित होते हैं।

कौन मतदान कर सकता है?

भारत मे लोकतांत्रिक प्रणाली सर्वसुलभ वयस्क मताधिकार के इस सिद्धांत पर आधारित है; कि 18 साल की आयु का कोई भी नागरिक निर्वाचन में मत डाल सकता है (1989 के पहले आयु सीमा 21 वर्ष थी)। मत देने का अधिकार जाति, पंथ, धर्म या लिंग का लिहाज किए बिना है। जो लोग विक्षिीप्त दिमाग के माने जाते हैं, और जो कतिपय आपराधिक अपराधों में दोष-सिद्ध किए गए हैं, उन्हें मत देने की अनुमति नहीं है। ‍

निर्वाचक नामावली

निर्वाचक नामावली निर्वाचन-क्षेत्र के ऐसे सभी लोगों की सूची होती है जो भारतीय निर्वाचनों में मत देने के लिए पंजीकृत होते हैं। केवल उन्हींे लोगों को मत देने की अनुमति दी जाती है जिनके नाम निर्वाचक नामावली पर दर्ज होते हैं। निर्वाचक नामावली को सामान्य तया प्रत्येहक वर्ष संशोधित किया जाता है ताकि ऐसे लोगों के नाम शामिल किए जा सकें जो उस वर्ष की पहली जनवरी को 18 साल के हो गए हों या एक निर्वाचन-क्षेत्र में रहने के लिए आ गए हों या ऐसे लोगों के नाम हटाए जा सकें जो मृत हो गए हों या एक निर्वाचन-क्षेत्र से बाहर रहने चले गए हों। यदि आप मत देने के लिए पात्र हैं और निर्वाचक नामावली पर नहीं हैं तो आप निर्वाचन-क्षेत्र के निर्वाचन रजिस्ट्रीकरण अधिकारी को आवेदन कर सकते हैं जो रजिस्टर का अद्यतनीकरण करेंगे। निर्वाचक नामावली का अद्यतनीकरण एक निर्वाचन प्रचार अभियान के दौरान, अभ्य र्थियों के लिए नाम-निर्देशनों की प्रक्रिया के समाप्त होने के बाद ही, समाप्त होता है।

नामावलियों का कम्यूटरीकरण

1998 में आयोग ने 620 मिलियन मतदाताओं की सम्पू‍र्ण निर्वाचक नामावलियों को कम्यूटरीकृत करने का ऐतिहासिक निर्णय लिया। यह कार्य पूरा किया जा चुका है और अब अच्छी तरह मुद्रित निर्वाचक नामावलियां उपलब्ध हैं। निर्वाचक नामावलियों में मतदाता की फोटो पहचान पत्र संख्या भी क्रॉस लिंकिंग के लिए मुद्रित की गई है। मुद्रित निर्वाचक नामावलियों के साथ-साथ इन नामावलियों वाली सीडी भी आम जनता को बिक्री करने के लिए उपलब्ध है। ये राष्ट्रीय और राज्यीय पार्टियों को, निर्वाचक नामावलियों के प्रत्येक संशोधन के उपरांत नि:शुल्क उपलब्धी कराई जाती हैं। समूचे देश की नामावलियां भी इस वेबसाइट पर उपलब्ध हैं।

निर्वाचक फोटो पहचान कार्ड (एपिक)

निर्वाचक नामावली की यथातथ्यता में सुधार लाने और निर्वाचकीय धोखाधड़ी रोकने के एक प्रयास में निर्वाचन आयोग ने अगस्त, 1993 में देश में सभी मतदाताओं के लिए फोटो पहचान कार्डों को बनाने का आदेश दिया। नवीनतम प्रौद्योगिकीय नवोन्मेषों का फायदा उठाने के लिए आयोग ने मई 2000 में एपिक कार्यक्रम के लिए दिशा-निर्देशों में संशोधन किया। अब तक, 450 मिलियन से अधिक पहचान कार्ड वितरित किए जा चुके हैं।

मतदाता शिक्षा

लोकतांत्रिक एवं निर्वाचकीय प्रक्रियाओं में मतदाताओं की सहभागिता किसी भी लोकतंत्र के सफल संचालन के लिए अनिवार्य है और स्वस्थ लोकतांत्रिक निर्वाचनों का आधार है। इसे महत्व देते हुए, भारत निर्वाचन आयोग ने, 2009 में, मतदाता शिक्षा और निर्वाचकीय सहभागिता को अपने निर्वाचन प्रबंधन के अनिवार्य भाग के रूप में औपचारिक रूप से अपनाया।

निर्वाचन कब आयोजित किए जाते हैं

लोक सभा और प्रत्येक राज्यीय विधान सभा के लिए निर्वाचन प्रत्येक पांच वर्षों पर कराए जाने होते हैं बशर्ते कि निर्वाचन पहले कराने की अपेक्षा न की गई हो। राष्ट्रपति उस परिस्थिति में पांच वर्ष बीतने से पहले साधारण निर्वाचन की अपेक्षा कर सकते हैं जब सरकार को लोक सभा का विश्वास न रह गया हो़, और शासन संभालने के लिए कोई वैकल्पिक सरकार न रह गई हो।

हाल के दिनों में, सरकारों ने लोक सभा के सम्पूर्ण कार्यकाल के लिए सत्ता में बने रहना अत्यन्त मुश्किल होते पाया है, और यही कारण है कि अक्सर पांच वर्ष की सीमा के पूरे होने के पहले ही निर्वाचन आयोजित किए जाते हैं। सरकार द्वारा घोषित आपातकाल के भाग के रूप में 1975 में पारित संवैधानिक संशोधन ने 1976 में आयोजित किए जाने वाले निर्वाचन को आस्थगित कर दिया। बाद में, यह संशोधन विखंडित कर दिया गया, और नियमित निर्वाचन 1977 में बहाल कर दिए गए

नियमित निर्वाचनों का आयोजन किया जाना संवैधानिक संशोधन के द्वारा और निर्वाचन आयोग के परामर्श से ही रोका जा सकता है, और यह बात मानी जाती है कि नियमित निर्वाचनों में व्यवधान असाधारण परिस्थितियों में ही स्वीकार्य हैं।

निर्वाचनों का कार्यक्रम-निर्धारण

जब पांच वर्षीय सीमा समाप्त हो जाए या विधान-मंडल का विघटन हो जाए तथा नए निर्वाचनों की अपेक्षा की जाए तो निर्वाचन आयोग निर्वाचन का आयोजन करने के लिए मशीनरी को सक्रिय करता है। संविधान में कहा गया है कि विघटित लोक सभा के अंतिम सत्र और नए सदन के बुलाए जाने के बीच 6 महीने से अधिक का अंतर नहीं होना चाहिए इसलिए, उसके पहले निर्वाचन सम्पन्न किए जाने होते हैं।

भारत जैसे विशाल एवं विभिन्नताओं वाले देश में ऐसी अवधि को ढूंढना जब निर्वाचन पूरे देश में आयोजित किए जाएं, आसान नहीं है। निर्वाचन आयोग, जो निर्वाचनों के लिए कार्यक्रम पर निर्णय लेता है, को मौसम का ख्याल रखना पड़ता है, सर्दियों में निर्वाचन-क्षेत्र हिमाच्छादित हो सकते हैं, और मानसून के दौरान दूरवर्ती क्षेत्रों तक अभिगमन सीमित हो सकता है, खेती का चक्र ताकि फसलों के रोपने या काटने में व्यवधान न पड़े, परीक्षाओं के कार्यक्रम- क्योंकि विद्यालयों का मतदान केन्द्रों के रूप में इस्तेमाल किया जाता है और शिक्षकों को निर्वाचन कर्मचारियों के रूप में नियोजित किया जाता है, और धार्मिक त्योहार एवं सार्वजनिक अवकाश। इनसे भी बड़ी संभारतंत्रगत कठिनाईयां भी हैं जो निर्वाचन का आयोजन करने के साथ जुड़ी हुई हैं- मत-पेटियां या ईवीएम भेजना, मतदान बूथ स्थापित करना, निर्वाचनों का पर्यवेक्षण करने के लिए कर्मचारियों की भर्ती करना।

आयोग सामान्यतया औपचारिक प्रक्रिया के शुरू होने से पहले कुछेक सप्ताह पहले एक प्रमुख प्रेस सम्मेलन में निर्वाचनों के कार्यक्रम की घोषणा करता है। ऐसी घोषणा के तुरंत बाद अभ्यर्थियों एवं राजनीतिक दलों के मार्गदर्शन के लिए आदर्श आचार संहिता तत्काल लागू हो जाती है। निर्वाचनों के लिए औपचारिक प्रक्रिया अधिसूचना या एक सदन के सदस्यों को निर्वाचित करने के लिए निर्वाचक मंडल से अपेक्षा करने वाली अधिसूचनाओं के साथ शुरू होती हैं। जैसे ही अधिसूचनाएं जारी की जाती हैं अभ्यर्थी उन निर्वाचन-क्षेत्रों में अपने नामां‍कन दाखिल करना शुरू कर सकते हैं जहां से वे लड़ना चाहते हैं। इनकी संबंधित निर्वाचन-क्षेत्र के रिटर्निंग अधिकारी द्वारा, उसके लिए निर्धारित लगभग एक सप्ताह की अवधि बीतने के बाद, संवीक्षा की जाती है। वैधीकृत रूप से नामित अभ्यर्थी संवीक्षा की तारीख से दो दिनों के भीतर स्पर्धा से नाम वापस ले सकते हैं। निर्वाचन लड़ने वाले अभ्यार्थी मतदान की वास्तविक तारीख से पहले राजनीतिक प्रचार के लिए कम से कम दो सप्ताहों का समय प्राप्त करते हैं। प्रचालनों के विशाल परिमाण और निर्वाचक के विशाल साइज के कारण राष्ट्रीय निर्वाचनों के लिए कम से कम तीन दिनों में मतदान आयोजित किया जाता है। मतगणना के लिए एक पृथक तारीख नियत की जाती है और संबंधित रिटर्निंग अधिकारी द्वारा प्रत्येक निर्वाचन-क्षेत्र के लिए परिणामों की घोषणा की जाती है। आयोग निर्वाचित सदस्यों की सम्पू‍र्ण सूची का संकलन करता है और सदन के विधिवत गठन के लिए एक उपयुक्त् अधिसूचना जारी करता है। इसके साथ, निर्वाचनों की प्रक्रिया पूरी हो जाती है और लोक सभा के मामले में, राष्ट्रपति, तथा राज्य विधान-मंडलों की दशा में संबंधित राज्यों के राज्यपाल तब अपने सत्रों का आयोजन करने के लिए अपने संबंधित सदनों को बुला सकते हैं। सम्पूर्ण प्रक्रिया में राष्ट्रीय निर्वाचनों के लिए 5 से 8 सप्तांह और विधान सभाओं के लिए पृथक निर्वाचनों में 4 से 5 सप्तांह लगते हैं।

निर्वाचन के लिए कौन खड़ा हो सकता है

ऐसा कोई भारतीय नागरिक, जो मतदाता के रूप में पंजीकृत है और जिसकी उम्र 25 वर्ष से अधिक है को लोक सभा या राज्य विधान सभाओं का निर्वाचन लड़ने की अनुमति है। राज्य सभा के लिए आयु की सीमा 30 वर्ष है।

प्रत्येक अभ्यर्थी को लोक सभा निर्वाचन के लिए 10,000/- रु और राज्य सभा या विधान सभा निर्वाचनों के लिए 5,000/- रु जमा करना होता है। अनुसूचित जातियों और अनुसूचित जनजातियों के अभ्यर्थी इन धनराशियों के आधे का भुगतान करते हैं। यह धनराशि तब लौटा दी जाती है जब अभ्यर्थी निर्वाचन-क्षेत्र में डाले गए वैध मतों की कुल संख्या का छठा भाग प्राप्त कर ले। नाम-निर्देशन पंजीकृत दल द्वारा प्रायोजित अभ्यर्थी की दशा में निर्वाचन-क्षेत्र के कम से कम एक पंजीकृत निर्वाचक द्वारा और अन्य अभ्यर्थियों की दशा में निर्वाचन-क्षेत्र के दस पंजीकृत निर्वाचकों द्वारा अवश्य रूप से अनुसमर्थित किए जाने चाहिए। निर्वाचन आयोग द्वारा नियुक्त् रिटर्निंग अधिकारी प्रत्ये्क निर्वाचन-क्षेत्र में अभ्यर्थियों के नाम-निर्देशन प्राप्ति करने के लिए, और निर्वाचन की औपचारिकताओं का पर्यवेक्षण करने के लिए रखे जाते हैं।

लोक सभा और विधान सभा में कई स्थानों में अभ्यर्थी , अनुसूचित जातियों या अनुसूचित जनजातियों में से किसी एक से हो सकते हैं। इन आरक्षित स्थानों की संख्या प्रत्येक राज्य में अनुसूचित जाति या अनुसूचित जनजातियों के लोगों की संख्या के लगभग अनुपात में निर्धारित किए जाने के निमित्त होती हैं। वर्तमान में, लोक सभा में अनुसूचित जातियों के लिए 79 और अनुसूचित जनजातियों के लिए 41 स्थान आरक्षित हैं।

अभ्यूर्थियों की संख्या

प्रत्येक निर्वाचन में निर्वाचन लड़ने वाले अभ्यर्थियों की संख्या निरंतर बढ़ी है। वर्ष 1952 के साधारण निर्वाचन में प्रत्येक निर्वाचन-क्षेत्र में अभ्यर्थियों की औसत संख्या 3.8 थी, 1991 तक यह बढ़कर 16.3 हो गई थी, और 1996 में यह 25.6 थी। चूंकि ‘अगंभीर’ अभ्यर्थियों के लिए निर्वाचन में खड़ा होना काफी आसान था इसलिए, अगस्त 1996 में कतिपय सुधारात्मक उपाय किए गए। इन उपायों में धनराशि की मात्रा बढ़ाना और लोगों की वह संख्या बढ़ाना जिन्हें एक अभ्यर्थी नामित करना है भी शामिल हैं। ऐसे उपायों के अनुवर्ती निर्वाचनों में काफी अच्छे परिणाम देखने को िमले। परिणामतः, 1998 लोक सभा निर्वाचनों में अभ्यर्थियों की संख्या घट कर प्रति निर्वाचन-क्षेत्र 8.74 हो गई। 1999 लोक सभा निर्वाचनों में यह 8.6 थी और 2004 में यह 10 थी।

प्रचार अभियान

प्रचार अभियान वह अवधि है जब राजनीतिक दल अपने अभ्य र्थियों और तर्कों को प्रस्तुत करते हैं जिनसे वे अपने अभ्यर्थियों तथा दलों को मत देने के लिए लोगों को सहमत करने की आशा करते हैं। अभ्यर्थियों को अपना नामांकन प्रस्तुत करने के लिए एक सप्ताह का समय दिया जाता है। इसकी संवीक्षा रिटर्निंग अधिकारियों द्वारा की जाती है तथा यदि यह सही नहीं पाया जाता है तो संक्षिप्त सुनवाई के पश्चांत इसे निरस्त किया जा सकता है। विधिमान्य रूप से नामांकित अभ्यर्थी नामांकनों की संवीक्षा किए जाने के पश्चात दो दिन के भीतर अपना नामांकन वापिस ले सकते हैं। अधिकारिक प्रचार अभियान नामांकित अभ्य्र्थियों की सूची तैयार किए जाने से कम से कम दो सप्ताह तक चलता है तथा यह अधिकारिक रूप से मतदान समाप्त होने से 48 घंटे पूर्व समाप्त हो जाता है।

निर्वाचन प्रचार अभियान के दौरान, राजनीतिक दलों तथा निर्वाचन लड़ने वाले अभ्यर्थियों से अपेक्षा की जाती है कि वे राजनीतिक दलों के बीच सर्वसम्मति के आधार पर निर्वाचन आयोग द्वारा तैयार की गई आदर्श आचार संहिता का पालन करें। आदर्श आचार संहिता में इस तरह के विस्तृत दिशानिर्देश दिए गए हैं कि निर्वाचन प्रचार अभियान के दौरान राजनीतिक दलों तथा अभ्यर्थियों को किस प्रकार का आचारण करना चाहिए। इसका अभिप्रेत यह है कि निर्वाचन प्रचार अभियान साफ-सुथरे माहौल में चलाए जाएं, राजनीतिक दलों या उनके समर्थकों के बीच टकराव एवं विवादों से बचा जाए तथा प्रचार अवधि के दौरान तथा उसके पश्चात जब तक परिणाम घोषित न हो, शांति एवं व्यवस्था बनाए रखा जाना सुनिश्चित किया जाए। आदर्श आचार संहिता में केन्द्र या राज्य में सत्ता्रूढ़ दल के लिए यह सुनिश्चित करने के लिए भी दिशानिर्देश विहित किए गए हैं कि समान अवसर दिए जाने के सिद्धांत को बरकरार रखा जाए तथा इस बात की शिकायत करने के लिए कोई कारण नहीं दिया जाए कि सत्तारूढ़ दल ने अपने निर्वाचन प्रचार के उद्देश्यसे अपनी शासकीय स्थिति का उपयोग किया है।

निर्वाचन की अपेक्षा किए जाने के पश्चा्त, दल घोषणा-पत्र जारी करते हैं, जिनमें वे उन कार्यक्रमों का विवरण देते हैं जिन्हें वे सरकार में निर्वाचित होने पर कार्यान्वित करने की चाहत रखते हैं, अपने नेताओं के प्रबल पक्ष और विरोधी दलों एवं उनके नेताओं की असफलताओं का विवरण देते हैं। दलों तथा मुद्दों को लोकप्रिय बनाने के लिए नारों का इस्तेसमाल किया जाता है तथा निर्वाचकों को पर्चे तथा पोस्टर वितरित किए जाते हैं। निर्वाचन क्षेत्रों में चारों तरफ रैलियां एवं बैठकें आयोजित की जाती हैं जिनमें अभ्यर्थीगण समर्थकों को राजी करने, बहलाने तथा उनमें जोश भरने का प्रयास करते है एवं विरोधियों की आलोचना करते हैं। यथासंभव अधिक से अधिक समर्थकों को प्रभावित करने की कोशिश करने के लिए अभ्यर्थीगण निर्वाचन क्षेत्र के कोने-कोने तक यात्रा करने के साथ-साथ व्यक्तिगत अपीलें तथा सुधारों के वादे करते हैं। पोस्टरों और प्लेाकार्डों पर मुद्रित दलीय प्रतीकों की भरमार होती है।

मतदान दिवस

मतदान सामान्यता भिन्न्-भिन्न निर्वाचन-क्षेत्रों में अलग-अलग दिनों में आयोजित किए जाते हैं ताकि सुरक्षा बल तथा निर्वाचन के अनुवीक्षण-कर्ता कानून एवं व्य्वस्था बनाए रखने में सक्षम हो सकें और निर्वाचन के दौरान निष्पक्ष मतदान कराया जाना सुनिश्चित किया जा सके।

मतपत्र तथा प्रतीक

अभ्यर्थियों के नाम-निर्देशन की प्रक्रिया पूरी हो जाने के पश्चात, रिटर्निंग अधिकारी द्वारा निर्वाचन लड़ने वाले अभ्यर्थियों की एक सूची तैयार की जाती है तथा मतपत्र मुद्रित किए जाते हैं। मत-पत्र अभ्यर्थियों के नामों (निर्वाचन आयोग द्वारा निर्धारित भाषाओं में) और हर एक अभ्यर्थी को आबंटित प्रतीकों के साथ मुद्रित किए जाते हैं। मान्यता-प्राप्तत दलों के अभ्यर्थियों को उनके दलीय प्रतीक आबंटित किए जाते हैं।

मतदान किस प्रकार होता है

मतदान गुप्त मतपत्र के द्वारा होता है। मतदान केन्द्र साधारणतया सार्वजनिक संस्थानों जैसे स्कूलों तथा सामुदायिक भवनों में स्थापित किए जाते हैं। यह सुनिश्चित करने के लिए कि यथासंभव अधिक से अधिक निर्वाचक मतदान करने में सक्षम हो सकें, निर्वाचन आयोग के अधिकारी इस बात की कोशिश करते हैं कि प्रत्ये क मतदाता से 2 कि.मी. के भीतर एक मतदान केन्द्र हो तथा यह कि किसी भी मतदान केन्द्र में 1500 से अधिक मतदाता न हों। प्रत्येक मतदान केन्द्र निर्वाचन के दिन कम से कम 8 घंटे के लिए खुला रहे।

मतदान केन्द्र में प्रवेश करने पर निर्वाचक की निर्वाचक नामावली के प्रति जांच की जाती है तथा एक मतपत्र आबंटित किया जाता है। निर्वाचक मतदान केन्द्र में एक स्क्री न्डथ कम्पार्टमेंट के भीतर अपने पसन्द के अभ्यार्थी के प्रतीक पर या उसके समीप मतपत्र पर रबड़ की मुहर लगाकर मतदान करता है। तब मतदाता मतपत्र को मोड़कर एक सामान्यक मत पेटी में डाल देता है, जो पूरी तरह पीठासीन अधिकारी तथा अभ्यरर्थियों के मतदान एजेंटों की नजरों के सामने किया जाता है। मुहर लगाने की इस प्रक्रिया से मत पत्रों को मतदान केन्द्र से नजर बचा कर निकाले जाने तथा मतपेटी में नहीं डाले जाने की संभावना दूर हो जाती है।

आयोग ने 1998 से, मतपत्रों के बजाय इलेक्ट्रॉयनिक वोटिंग मशीनों का निरंतर बढ़ती संख्या‍ में प्रयोग किया है। वर्ष 2003 में, सभी राज्जीय निर्वाचन तथा उप-निर्वाचन ईवीएम का इस्तेमाल करके आयोजित किए गए। इससे प्रोत्साहित होकर आयोग ने वर्ष 2004 में कराए जाने वाले लोक सभा निर्वाचन के लिए केवल ईवीएम का ही प्रयोग करने का ऐतिहासिक निर्णय लिया। इस निर्वाचन में दस लाख से अधिक ईवीएमों का प्रयोग किया गया।

राजनीतिक दल तथा निर्वाचन

राजनीतिक दल आधुनिक सामूहिक लोकतंत्र का एक सुस्थाापित अंग हैं, तथा भारत में निर्वाचनों का संचालन मुख्य रूप से राजनीतिक दलों के बर्ताव पर निर्भर करता है। हालांकि, भारतीय निर्वाचनों के अनेक अभ्यर्थी निर्दलीय होते हैं, फिर भी, लोक सभा तथा विधान सभा निर्वाचनों के विजेता अभ्यर्थीगण सामान्यतया राजनीतिक दलों के सदस्यों के रूप में खड़े होते हैं, तथा जनमत सर्वेक्षणों से यह संकेत मिलता है कि लोगों में व्यक्ति-विशेष के बजाय किसी दल को मत देने की प्रवृत्ति होती है। दल, अभ्यंर्थियों को संगठनात्मक सहयोग देते हैं, तथा सरकार के रिकार्ड को देखते हुए एवं सरकार के लिए वैकल्पिक प्रस्ता वों को सामने लाकर, एक व्यापक निर्वाचन प्रचार अभियान प्रस्तुत करके, मतदाताओं की इस बात का चुनाव करने में सहायता करते हैं कि सरकार किस प्रकार चलाई जाए।

निर्वाचन आयोग में पंजीकरण कराना

राजनीतिक दलों को निर्वाचन आयोग में पंजीकृत कराना होता है। आयोग यह निर्धारित करता है कि क्या दल संरचित है तथा भारतीय संविधान के अनुसार लोकतंत्र, पंथनिरपेक्षता तथा समाजवाद के सिद्धांतों के प्रति प्रतिबद्ध है तथा भारत की संप्रभुता, एकता एवं अखंडता को बनाए रखेगा। दलों से यह अपेक्षा की जाती है कि वे संगठनात्मक निर्वाचन कराएं तथा उनके पास एक लिखित संविधान हो।

प्रतीकों की मान्यता एवं आरक्षण

राजनीतिक क्रियाकलाप की समयावधि तथा निर्वाचनों में सफलता से संबंधित निर्वाचन आयोग द्वारा निर्धारित निश्चित मानदण्ड के अनुसार, आयोग द्वारा दलों को राष्ट्रीय या राज्यीय दलों के रूप में वर्गीकृत किया जाता है या केवल पंजीकृत-गैर-मान्यता प्राप्त दल घोषित किया जाता है। कोई दल किस प्रकार वर्गीकृत किया गया है उससे कतिपय विशेषाधिकारों जैसे निर्वाचक नामावलियों की सुलभता तथा राज्य स्वामित्व वाले टेलीविजन तथा रेडियो स्टेशनों-आकाशवाणी तथा दूरदर्शन-पर राजनीतिक प्रसारणों के लिए समय उपलब्ध कराना-तथा दलीय प्रतीकों के आबंटन संबंधी महत्वषपूर्ण मामले के प्रति दल के अधिकार का निर्धारण होता है। दलीय प्रतीकों से निरक्षर मतदाता उस दल के अभ्यर्थी की पहचान करने में सक्षम होते हैं जिसके लिए वे मतदान करना चाहते हैं। राष्ट्रीय दलों को ऐसे प्रतीक दिए जाते हैं, जो पूरे देश में केवल उनके प्रयोग के लिए ही होते हैं। राज्यीय दलों के पास उस राज्य में प्रतीक का एकमात्र उपयोग करने का अधिकार होता है जिनमें उन्हें उस रूप में मान्यता दी गई है, पंजीकृत-गैर-मान्यता प्राप्त दल ‘मुक्त’ प्रतीकों के संकलन में से प्रतीक का चुनाव कर सकते हैं।

मतदान व्यय की सीमा

निर्वाचन प्रचार के दौरान किसी अभ्यर्थी द्वारा व्यय की जाने वाली धनराशि पर सख्त कानूनी सीमाएं हैं। दिसम्बर 1997 से, अधिकांश लोक सभा निर्वाचन-क्षेत्रों में यह सीमा रु. 15,00,000/- थी, तथापि, कुछ राज्यों में यह सीमा रु. 6,00,000/- है (विधान सभा निर्वाचनों के लिए अधिकतम सीमा रु. 6,00,000/- तथा न्यूनतम सीमा रु. 3,00,000/- है)। अक्टूेबर 2003 में हालिया संशोधन ने इन सीमाओं में वृद्धि कर दी है। बड़े राज्यों में लोक सभा सीटों के लिए अब यह सीमा रु. 25,00,000/- है। अन्ये राज्यों तथा संघ शासित क्षेत्रों में, यह रु. 10,00,000 से लेकर रु. 25,00,000/- तक के बीच है। इसी प्रकार, बड़े राज्यों में विधान सभा सीटों के लिए, अब यह सीमा रु. 10,00,000/- है, जबकि अन्य राज्योंं तथा संघ शासित क्षेत्रों में यह रु. 5,00,000/- से लेकर रु. 10,00,000/- तक के बीच है। हालांकि, किसी अभ्यर्थी के समर्थक अपनी इच्छानुसार प्रचार के माध्यम से मदद करने के लिए जितना चाहें खर्च कर सकते हैं, लेकिन, उन्हेंस अभ्यर्थी से लिखित अनुमति लेनी होती है, तथा जबकि दलों को प्रचार अभियानों में अपनी इच्छाानुसार खर्च करने की अनुमति है, फिर भी, उच्चतम न्यायालय के हाल के निर्णयों में कहा गया है कि जब तक कि कोई दल प्रचार के दौरान खर्च की गई राशि का लेखा विशिष्ट रूप में प्रस्तुत नहीं करता है, वह किसी भी कार्य-कलाप को अभ्यर्थियों द्वारा वित्त -पोषित किया गया मानेगा और उसे उनके निर्वाचन व्यय में जोड़ा जाएगा। अभ्यर्थियों तथा दलों पर सौंपी गई जवाबदेही ने अत्यधिक खर्चीले ऐसे निर्वाचन-प्रचार-अभियानों पर कुछ अंकुश लगाया है जो पहले भारतीय निर्वाचनों के एक अंग थे।

राज्य के स्वामित्व वाले इलेक्ट्रॉनिक मीडिया पर नि:शुल्क प्रचार समय

निर्वाचन आयोग द्वारा, सभी मान्यता -प्राप्त राष्ट्रीय तथा राज्यीय दलों को निर्वाचनों के दौरान अपने प्रचार अभियानों के लिए व्यापक स्तर पर राज्य क स्वामित्व वाले इलेक्ट्रॉनिक मीडिया-आकाशवाणी तथा दूरदर्शन में मुफ्त प्रचार-सुविधा की अनुमति दी गई है। राज्य‍ के स्वामित्व वाले टेलीविजन एवं रेडियो चैनलों पर कुल 122 घंटे से अधिक का मुफ्त समय आबंटित किया गया है। इसे बेस लिमिट और हालिया निर्वाचन में दल के निर्वाचन निष्पादन से जुड़े अतिरिक्त समय को मिलाकर न्यायोचित तरीके से आबं‍टित किया जाता है।

विभाजन तथा विलय एवं दल-बदल विरोधी कानून

विभाजनों, विलयों तथा गठबंधनों ने राजनीतिक दलों की संरचनाओं को बहुधा अस्त-व्यस्त किया है। इसके परिणामस्वरूप इन बातों पर कई प्रकार के विवाद उत्प न्न् होते हैं कि एक विभाजित दल के किस हिस्से को दल का प्रतीक मिले, और परिणामी दलों को राष्ट्रीय एवं राज्यीय दलों की दृष्टियों से किस प्रकार विभाजित किया जाए। निर्वाचन आयोग को इन विवादों का निपटारा करना होता है हालांकि, इसके निर्णयों को न्यायालयों में चुनौती दी जा सकती है।

निर्वाचन याचिकाएं

कोई भी निर्वाचक या अभ्यर्थी उस परिस्थिति में निर्वाचन याचिका दाखिल कर सकता है यदि वह सोचता है कि निर्वाचन के दौरान कदाचार हुआ है। निर्वाचन याचिका एक साधारण सिविल मुकदमा नहीं होता है, परन्तु इसे चुनाव लड़ने के रूप में देखा जाता है जिसमें पूरा निर्वाचन-क्षेत्र शामिल होता है। निर्वाचन याचिकाओं की सुनवाई संबंधित राज्य के उच्च न्यायालय द्वारा की जाती है तथा यदि इसे मान्य ठहराया जाता है, तो उसके परिणामस्वरूप उस निर्वाचन-क्षेत्र में निर्वाचन का पुनर्प्रबंध भी किया जा सकता है।

निर्वाचनों का पर्यवेक्षण करना, निर्वाचन प्रेक्षक

यह सुनिश्चित करने के लिए कि प्रचार अभियान निष्पक्ष रूप से संचालित किया जाए तथा लोग स्वतंत्रतापूर्वक अपनी इच्छा से मतदान कर सकें, निर्वाचन आयोग बड़ी संख्या में प्रेक्षकों को नियुक्त करता है। निर्वाचन व्यूय प्रेक्षक उस धनराशि पर अंकुश रखते हैं जो प्रत्येक अभ्यर्थी और दल निर्वाचन में खर्च करता है।

मतों की गणना

मतदान समाप्त‍ होने के पश्चात, निर्वाचन आयोग द्वारा नियुक्त रिटर्निंग अधिकारियों तथा प्रेक्षकों के पर्यवेक्षण में मतों की गणना की जाती है। मतों की गणना समाप्त होने के पश्चात रिटर्निंग अधिकारी उस अभ्यर्थी के नाम की विजेता के रूप में घोषणा करते हैं जिसे सर्वाधिक संख्या में मत प्राप्त हुए हों, तथा संबंधित सदन के निर्वाचन-क्षेत्र द्वारा निर्वाचित घोषित करते हैं।

मीडिया कवरेज

निर्वाचन प्रक्रिया में यथा-संभव अधिक से अधिक पारदर्शिता लाने के उद्देश्य से, मीडिया को प्रोत्साहित किया जाता है तथा उसे निर्वाचन को कवर करने की सुविधाएं उपलब्ध कराई जाती हैं; हालांकि, इस शर्त पर कि मत की गोपनीयता बनी रहे। मतदान प्रक्रिया को कवर करने के लिए मतदान केन्द्रों में तथा मतों की वास्ताविक गिनती के दौरान मतगणना हॉलों में प्रवेश करने के लिए मीडिया कर्मियों को विशेष पास दिए जाते हैं।


 
अन्य लिंक्स
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